धर्मवीर #हकीकतराय और उनकी पत्नी लक्ष्मी के बलिदान दिवस पर सादर श्रद्धांजली ….
January 29th, 2020 | Post by :- | 267 Views

बसंत पंचमी का उत्सव धर्म के लिए बलिदान देने वाले वीर हकीकत राय की धर्मनिष्ठा के लिए भी याद किया जाता है. वीर हकीकत राय के साथ उनकी पत्नी लक्ष्मी देवी ने भी आत्मदाह किया था. साथ ही यह घटना इस बात का भी अहेसास कराती है कि – मुसलमान किस तरह से बच्चों के मामूली झगडे को धार्मिक रंग दे देते हैं.

धर्मवीर “हकीकत राय” का जन्म सन 1719 में कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की द्वादशी को स्यालकोट (आज के पापिस्तान) में हुआ था. उनके पिता लाला भागमल खत्री एक धनवान व्यापारी थे. जब वे 13 साल के थे तो उस समय की बाल विवाह परम्परा के aनुसार बटाला के श्री किशन सिंह की पुत्री लक्ष्मी देवी से कर दिया गया था.

हकीकत बचपन से ही बहुत कुशाग्र बुद्धि थे. उनके दादा, माँ तथा एक पंडित जी उन्हें धर्म ग्रंथो और गणित की शिक्षा देते थे. उन दिनों व्यापार के लिए फारसी जानना भी आवश्यक था इसलिए उनके पिता ने हकीकत लाहौर के एक मदरसे में फारसी सीखने भेजा. अपनी कुशाग्र बुद्ध से वहां के मौलवी भी बहुत प्रभावित हुए.

लेकिन हकीकत को ज्यादा महत्त्व मिलने से अन्य मुस्लिम छात्र उनसे ईर्ष्या करने लगे 1734 की वसंतपंचमी का दिन थी. सभी बच्चे मदरसे में थे. अचानक कोई काम आ जाने से मौलवी को कहीं जाना पड़ गया. मौलवी के जाने के बाद बच्चों में विवाद हो गया. मुस्लिम बच्चे हकीकत के सामने माता दुर्गा और माता सरस्वति को गाली देने लगे.

इस पर हकीकत ने कहा मेरे लिए तो फातिमा और आयशा भी दुर्गा और सरस्वति के समान हैं. इस पर उन मुस्लिम बच्चों ने मामले को दुसरी तरफ मोड़ दिया. मौलवी के आने के बाद उन मुस्लिम बच्चों ने मौलवी से कहा कि – हकीकत इस्लाम का अपमान कर रहा है और फातिमा / आयशा को गाली दे रहा है.

मौलबी उन बच्चों को लेकर काजी के पास गया. काजी उनको लेकर लाहौर के नवाव सफ़ेद खान के पास गया. काजी ने इस्लाम का अपमान करने के अपराध में हकीकत राय को म्रत्युदण्ड की सजा सुनाई. लेकिन साथ ही यह भी कहा कि अगर हकीकत राय इस्लाम कबूल कर मुसलमान बन जाए तो उसे क्षमा कर दिया जाएगा.

परन्तु हकीकत राय ने धर्म छोड़ने से इनकार कर दिया. तब सफ़ेद खान ने यह भी प्रस्ताव रखा कि – अगर वह मुसलमान बनता है तो उसे जीवनदान भी मिलेगा और वह अपनी इकलोती बेटी “दुस्तर” से निकाह भी करवा देगा. हकीकत की माँ कोरा ने अपने पुत्र हकीकत से मौत से बचने के लिए मुसलमान बन जाने को कहा.

लेकिन 14 वर्ष के बालक वीर हकीकत राय का उत्तर था कि- क्या मुसलमान बन जाने से मुझे कभी भी मौत नहीं आएगी ? उनके इस प्रश्न का उत्तर किसी के पास नही था. तब काजी ने लाहौर से 4 किलोमीटर दूर “खोजे शाह के कोट” में वसंत पंचमी के मेले में ले जाकर हकीकत का सर काट कर प्राण दण्ड देने का आदेश दिया.

मौलवियों को पूरा विश्वास था कि- मेले में अपनी मौत सामने देखकर हकीकत अवश्य ही इस्लाम कबूल कर लेगा. लेकिन हकीकत अपने धर्म पर अटल रहा और मौलवियों से ही सवाल करता रहा कि – कितना कमजोर है तुम्हारा धर्म जो ऐसे खतरे में आ जाता है. इस पर मौलवी और भी ज्यादा नाराज हो गए.

सफ़ेदखान ने फिर कहा कि – हम नहीं चाहते कि तुम्हारी जान जाए. अगर तुम इस्लाम कबुल कर लो तो तुम्हारी जान बच जायेगी. इसके अलाबा हम अपनी बेटी का निकाह तुम्हारे साथ कर देंगे जिससे आने वाले समय में तुम भी नबाब बन सकते हो. लेकिन इस पर हकीकत ने कटाक्ष किया कि – बेटी का सौदा करके धर्म परिवर्तन कराते हो ?

तब काजी ने जल्लाद को तुरंत हकीकत का सर काटने का हुक्म दिया. आदेश पाकर जल्लाद ने हकीकत का सर काटकर “शहीद” कर दिया. उसी दिन लाहौर में रावी के तट पर हकीकत का अंतिम संस्कार कर दिया गया. हकीकत के इस बलिदान की खबर जब उनकी ससुराल बटाला में पहुंची तो वहां भी कोहराम मच गया.

लेकिन हकीकत की पत्नी लक्ष्मी देवी शांत बनी रही. उन्होंने पति के वियोग में आत्मदाह कर प्राण त्यागने का निश्चय कर लिया. उन्होंने स्वयं अपने हाथों से अपनी चिता तैयार की और अपने पति का ध्यान कर उस चिता में कूद गई. इस प्रकार हकीकत और उनकी पत्नी लक्ष्मी धर्म की खातिर बलिदान हो गए.

कालांतर में जब “महाराजा रंजीत सिंह” का राज हुआ तो उन्होंने लाहौर में रावी के तट पर “वीर हकीकत राय” की समाधि का निर्माण कराया साथ ही बटाला में भी “देवी लक्ष्मी” की समाधि बनबाई. प्रत्येक बसंत पंचमी पर उन धर्मवीरों की याद में मेला लगाया जाने लगा. बंटबारे के बाद हकीकत राय की समाधि पापिस्तान में रह गई.

लक्ष्मी देवी की समाधि पर आज भी बसंत पंचमी पर प्रतिवर्ष भारी मेला लगता है और धर्मवीर युगल का स्मरण किया जाता है. वर्ष 1782 में अग्गर सिंह (अग्र सिंह) नाम के एक कवि ने बालक हकीकत राय के बलिदान पर एक पंजाबी लोकगीत लिखा. महाराजा रणजीत सिंह के मन में बालक हकीकत राय के लिए विशेष श्रद्धा थी.

बीसवीं सदी के पहले दशक (1905-10) में, कुछ बंगाली लेखकों ने निबन्ध के माध्यम से हकीकत राय के बलिदान की कथा को लोकप्रिय बनाया. आर्य समाज, ने हकीकत राय के हिन्दू धर्म के प्रति गहरी निष्ठां को प्रदर्शित करने वाला एक नाटक ‘धर्मवीर’ में प्रस्तुत किया. इस कथा की मुद्रित प्रतियां नि:शुल्क वितरित की गयीं.

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