पांगी घाटी में 12 दिनों तक चलने वाले जुकारू उत्सव का हुआ आगाज #news4
February 2nd, 2022 | Post by :- | 135 Views

पांगी : जिला चम्बा के जनजातीय क्षेत्र पांगी में बुधवार को पारंपरिक जुकारू उत्सव शुरू हो गया है। घाटी में अगले 12 दिनों तक जुकारू उत्सव की धूम रहेगी। पुरानी परंपरा का निर्वहन करते उत्सव का आगाज हुआ। लंबे समय से जुकारू उत्सव को मनाने की परंपरा पांगी घाटी के अलावा बाहरी राज्यों और प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में बसे पांगी घाटी के लोग निभा रहे हैं। इस उत्सव को लेकर लोगों में खासा उत्साह रहता है। घाटी में मौसम के खुलने के बाद लोग एक-दूसरे घरों में जाकर उनका कुशलक्षेम पूछते हैं। वीरवार को घाटी के लोग सुबह चार बजे घर के नजदीक के प्राकृतिक जल स्रोत से पानी भरेंगे और परिवार के सदस्यों के साथ पूजा-अर्चना करेंगे। जुकारू उत्सव को लेकर लोग घरों को लिपाई-पुताई का कार्य करते हैं। इसके साथ ही बलि राज के चित्र अपने घरों में बनाते हैं। त्यौहार समूची पांगी घाटी में एक जैसा मनाया जाता है। इसी त्यौहार पर घाटी की परंपरा कायम है। जुकारू को तीन चरणों में मनाया जाता है। कई दिन पहले से लोग इसकी तैयारियां शुरू कर देते हैं घरों को सजाया जाता है। घर के अंदर लिखावट के माध्यम से लोक शैली में अल्पनाएं रेखांकित की जाती हैं। पकवान विशेष मण्डे पकाए जाते हैं तथा अन्य सामान्य पकवान भी बनाए जाते हैं। सिल्ह की शाम को घर के मुखिया द्वारा भरेस भंगड़ी और आटे के बकरे बनाए जाते हैं। बकरे बनाते समय कोई भी किसी से बातचीत नहीं करता है। पूजा की सामग्री को एक अलग कमरे में ही रखा जाता है। रात्रिभोज के बाद गोबर की लिपाई जिसे चौका कहते हैं वह की जाती है। गोमूत्र और गंगा जल छिड़का जाता है। गेहूं के आटे व जो के सत्तुओं से मंडप लिखा जाता है। इसे चीका कहा जाता है। मंडप के ऊपर राजा बलि जिसे स्थानीय जन बलदानों कहते हैं की आटे से बनी मूॢत की स्थापना की जाती है। इसके अलावा आटे से बने बकरे, मेढ़े आदि मंडप में तिनकों के सहारे रखे जाते हैं। मंडप बनाने वाला राजा बलि की पूजा करता है, लेकिन घाटी के बहुत से घरों में यह परंपरा लुप्त होती जा रही है। वहीं लोग इस परंपरा का निर्वाहन कर रहे हैं जिन्हें अपनी संस्कृति की जानकारी तथा उससे प्यार है। कुछ लोग घरों की भीतरी दीवारों में राजा बलदानों का चित्र चित्रित करके राजा बलि का पूजन करते हैं।

राजा बलि को पूजते हैं घाटीवासी
एक दन्तकथा के अनुसार भगवान विष्णु के परमभक्त प्रहलाद के प्रपौत्र राजा बलि ने अपने पराक्रम से तीनों लोकों को जीत लिया तो भगवान विष्णु को वामनावतार धारण करना पड़ा। राजा बलि ने वामनावतार भगवान विष्णु को तीनों लोकों को दान के रूप में दे दिया। बदले में भगवान विष्णु ने राजा बलि को इस भू-लोक में पूजे जाने का वरदान दिया परिणामतया आज तक घाटी के लोग राजा बलदानों को पूजते आ रहे हैं। लोक मान्यता के अनुसार तीन दिन तक प्रत्येक घर का कोई भी सदस्य ऊंचे स्वर में बात नहीं कर सकता न ही लकड़ी काट सकता है। यह सब कुछ राजा बलदानों के सम्मान में किया जाता है।

दूसरे दिन बड़ों का चरणवंदन कर लेते हैं आशीर्वाद
दूसरा दिन पड़ीद का होता है। सुबह ब्रह्ममुहूर्त में उठकर लोग स्नाननादि से निवृत्त होकर राजा बलि के समक्ष नतमस्तक होते हैं। इसके साथ घर के छोटे सदस्य बड़े सदस्यों की चरणवंदना करते हैं तथा बड़े उन्हें आशीर्वाद देते हैं। राजा बलि के लिए पनघट से जल लाया जाता है। लोग जल देवता का पूजन करते हैं। घर का वातावरण बेहद सुखद होता है। घर का मुखिया इस दिन चूंर बैल की भी पूजा करता है क्योंकि चूंर उसके खेतों में जोताई करके अन्न की पैदावार में सहयोगी जो होता है।

अब सिलसिला शुरू होता है घर-घर जाकर शुभ-शगुन करने का
पंगवाल संस्कृति में बड़ों को अधिक अधिमान दिया जाता है। बड़े भाई के घर में जाकर छोटा भाई शुभ कहता है और बड़ा भाई शगुन कहकर अभिवादन स्वीकार करता है। दोनों गले मिलते हैं छोटे हो या बड़े, बाल-बालाएं, वृद्ध-युवक एक दूसरे के गले मिलकर कहते हैं तकडा थियां न अर्थात कुशल मंगल हो। इस प्रकार सारा दिन यह कार्यक्रम चलता रहता है। जुकारू का तीसरा दिन मांगल व पन्हेई के रूप में मनाया जाता है। पन्हेई किलाड़ परगने में मनाई जाती है जबकि साच परगने में इसे मांगल कहते हैं। पन्हेई और मांगल में कोई विशेष अन्तर नहीं है क्योंकि मात्र संज्ञात्मक शब्द की भिन्नता है मनाने का उदेश्य एवं विधि एक जैसी है। फर्क इतना है कि साच परगने में मांगल द्वितीया तिथि को मनाई जाती है जबकि किलाड़ में पन्हेई तृतीया तिथि के उपरान्त मनाने का, विधान है। मांगल के दिन लोग भूमिपूजन के लिए निर्धारित स्थान पर इकट्ठे होते हैं। आज के दिन प्रत्येक घर से सत्तु, घी, शहद, मण्डे, आटे के बकरे तथा देसी घी का सोमरस शराब लाया जाता है। अपने-अपने घरों से लाई गई भोजन सामग्री को आपस में बांटा जाता है। मदिरापान करने से पूर्व पृथ्वी पूजन किया जाता है। अगला कार्यक्रम नाचगान का होता है पारंपरिक लोक धुनों पर थिरकती बालाएं, ढोल के थाप, नृत्य करते लोक दैवीय अनुभूति का एहसास करवाते हैं। चारों को हिम का धवल प्रकाश एक मनोरम दृश्य प्रस्तुत करता है। नाच-गान के उपरान्त धरती मां से प्रार्थना की जाती है। अर्थात हमारी फसलों को नष्ट करने वाले जीव-जंतु नदी के उस पार रहें तथा हम निर्भय होकर फसल उगाएं। हे धरती मां हमें फसलों से भरपूर कर दो। समारोह की समाप्ति के बाद सभी लोग अपने-अपने घरों को वापस आते हैं तो दरवाजे पर पहुंचने पर उन्हें दरवाजा बंद मिलता है। दरवाजा खटखटाया जाता है। अंदर से आवाज आती है, तुम कौन हो मैं मांगलू हूं। क्या लाए हो। धन और अन्न और क्या लाए हो, सुख-समृद्धि। दरवाजा खोल दिया जाता है। अब राजा बलि को विदा करने का समय आ जाता है। राजा बलदानों की पूजा की जाती है। इसके उपरांत आटे की बनी राजा बलि की प्रतिमा को विसॢजत कर दिया जाता है जुकारू यही समाप्त नहीं होता। यह सिलसिला निरंतर बारह दिनों तक चला रहता है। पन्हेई या मांगल द्वितीया तिथि से पंचमी तिथि तक मनाई जाती है। यदि किसी व्यक्ति के घर कोई सन्तान पैदा हुई हो तो विषम महीनों या वर्षों में इस दिन प्रीतिभोज का आयोजन करता है, जिसे शिख वधेई का पर्याय माना जाता है। शिख यथेई मुंडन संस्कार को कहते हैं। पन्हेई या मांगल के दिन संतानोत्पत्ति की खुशी में गांव के लोगों को प्रीतिभोज दिया जाता है।

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