मकर संक्रांति के बारे में 25 पौराणिक तथ्य और सत्य
January 13th, 2023 | Post by :- | 137 Views
सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने के समय को मकर संक्रांति कहते हैं। यह ऋतु परिवर्तन, फसल कटाई और बुवाई, उत्तरायण का त्योहार है लेकिन इसके साथ ही इसके साथ कई पौराणिक तथ्‍य भी जुड़ें हैं साथ ही कई परंपराएं भी इसके साथ जुड़ी हुई है। जानिए इस संबंध में 25 खास जानकारी।
1. हिन्दू धर्मशास्त्रों के अनुसार मकर संक्रांति के दिन सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण गति करने लगते हैं। हालांकि इस बात को लेकर मतभेद हैं।
2. इस दिन से देवताओं का छह माह का दिन आरंभ होता है, जो आषाढ़ मास तक रहता है।
3. इसी दिन सूर्य अपने पुत्र शनि के घर एक महीने के लिए जाते हैं, क्योंकि मकर राशि का स्वामी शनि है।
4. मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई सागर में जाकर मिली थीं।
5. इसी दिन महाराज भगीरथ ने अपने पूर्वजों के लिए तर्पण किया था इसलिए मकर संक्रांति पर गंगासागर में मेला लगता है। इसीलिए तभी से तर्पण प्रथा भी प्रचलित हुई।
6. इस दिन भगवान विष्णु ने असुरों का अंत करके युद्ध समाप्ति की घोषणा की थी। उन्होंने सभी असुरों के सिरों को मंदार पर्वत में दबा दिया था। इसलिए यह दिन बुराइयों और नकारात्मकता को खत्म करने का दिन भी माना जाता है।
7. महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिए सूर्य के उत्तरायण होने का ही इंतजार किया था। कारण कि उत्तरायण में देह छोड़ने वाली आत्माएं या तो कुछ काल के लिए देवलोक में चली जाती हैं या पुनर्जन्म के चक्र से उन्हें छुटकारा मिल जाता है।
8. सूर्य की सातवीं किरण भारत वर्ष में आध्यात्मिक उन्नति की प्रेरणा देने वाली है। सातवीं किरण का प्रभाव भारत वर्ष में गंगा-जमुना के मध्य अधिक समय तक रहता है। इस भौगोलिक स्थिति के कारण ही हरिद्वार और प्रयाग में माघ मेला अर्थात मकर संक्रांति या पूर्ण कुंभ तथा अर्द्धकुंभ के विशेष उत्सव का आयोजन होता है।
9. सूर्य संस्कृति में मकर संक्रांति का पर्व ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गणेश, आद्यशक्ति और सूर्य की आराधना एवं उपासना का पावन व्रत है, जोतन-मन-आत्मा को शक्ति प्रदान करता है।
10. संत-महर्षियों के अनुसार इसके प्रभाव से प्राणी की आत्मा शुद्ध होती है। संकल्प शक्ति बढ़ती है। ज्ञान तंतु विकसित होते हैं। मकर संक्रांति इसी चेतना को विकसित करने वाला पर्व है। यह संपूर्ण भारत वर्ष में किसी न किसी रूप में आयोजित होता है।
11. विष्णु धर्मसूत्र में कहा गया है कि पितरों की आत्मा की शांति के लिए एवं स्व स्वास्थ्यवर्द्धन तथा सर्वकल्याण के लिए तिल के छः प्रयोग पुण्यदायक एवं फलदायक होते हैं- तिल जल से स्नान करना, तिल दान करना, तिल से बना भोजन, जल में तिल अर्पण, तिल से आहुति, तिल का उबटन लगाना।
12. सूर्य के उत्तरायण होने के बाद से देवों की ब्रह्म मुहूर्त उपासना का पुण्यकाल प्रारंभ हो जाता है। इस काल को ही परा-अपरा विद्या की प्राप्ति का काल कहा जाता है। इसे साधना का सिद्धिकाल भी कहा गया है। इस काल में देव प्रतिष्ठा, गृह निर्माण, यज्ञ कर्म आदि पुनीत कर्म किए जाते हैं। मकर संक्रांति के एक दिन पूर्व से ही व्रत उपवास में रहकर योग्य पात्रों को दान देना चाहिए।
13. रामायण काल से भारतीय संस्कृति में दैनिक सूर्य पूजा का प्रचलन चला आ रहा है। मकर संक्रांति सूर्यपूजा का विशेष दिन है। राम कथा में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम द्वारा नित्य सूर्य पूजा का उल्लेख मिलता है।
14. प्रचलन से मकर संक्रांति के साथ तिल, गुड़, पतंग, गिल्ली डंडा खेलाना आदि कई परंपराएं जुड़ी चली गई।
15. मकर संक्रांति के दिन सूर्य को अर्घ्य देने का खास महत्व है।
16. मकर संक्रांति के दिन पवित्र नदी में स्नान का भी महत्व है।
17. मकर संक्रांति के दिन दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है।
18. मकर और कर्क संक्रांति को छोड़कर संक्रान्ति दिन या रात्रि दोनों में हो सकती है। दिन वाली संक्रान्ति पूरे दिन भर पुण्यकाल वाली होती है।
19. बारह संक्रांतियां 7 प्रकार की, 7 नामों वाली हैं, जो किसी सप्ताह के दिन या किसी विशिष्ट नक्षत्र के सम्मिलन के आधार पर मानी गई हैं। ये हैं- मन्दा, मन्दाकिनी, ध्वांक्षी, घोरा, महोदरी, राक्षसी एवं मिश्रिता।
20. नक्षत्र पर आधारित संक्रांतियां-  ध्रुव, मृदु, क्षिप्र, उग्र, चर, क्रूर या मिश्रित कही गई है जिसका अलग अलग फल बताया जाता है।
21. कालांतार में संक्रांति का देवीकरण हो गया और वह साक्षात्‌ दुर्गा कही जाने लगी। जैसे अब वो किसी न किसी वाहन, उप वाहन आदि पर सवार होकर आती है।
22. प्रत्येक संक्रंति के दान भी अलग अलग बताए गए हैं। मेष में भेड़, वृषभ में गायें, मिथुन में वस्त्र, भोजन एवं पेय पदार्थ, कर्क में घृतधेनु, सिंह में सोने के साथ वाहन, कन्या में वस्त्र एवं गौएं, नाना प्रकार के अन्न एवं बीज, तुला-वृश्चिक में वस्त्र एवं घर, धनु में वस्त्र एवं वाहन, मकर में ईंधन एवं अग्नि, कुम्भ में गौएं जल एवं घास, मीन में नए पुष्प दान किए जाने का उल्लेख मिलता है।
23. मकर संक्रांति के सम्मान में अब 3 दिनों या एक 1 दिन का उपवास भी रखा जाता है। जो व्यक्ति तीन दिनों का उपवास रखता है उसकी मनचाही इच्छा पूर्ण होती है। एक दिन का उपवास करने वाला पापों से मुक्ति हो जाता है।
24. मकर संक्रांति को हर प्रांत में अलग अलग रूप में मनाया जाता है। जैसे तमिलनाडु या संपूर्ण दक्षिण भारत में पोंगल के रूप में इसे मनाते हैं।  पोंगल तमिल वर्ष का प्रथम दिवस है। असम में माघ बिहू के रूप में, पंजाब, हरियाणा और जम्मू कश्मीर में लोहड़ी के रूप में और गुजरात में उत्तरायण के रूप में इसे मनाते हैं। सिंध में या सिन्धी समाज लाल लोही के रूप में मनाता है। उत्तर प्रदेश और बिहार में खिचड़ी पर्व के रूप में इसे मनाते हैं। केरल में मकर ज्योति के रूप में मनाते हैं।
25. मकर रेखा दक्षिणी गोलार्द्ध में भूमध्य रेखा के समानांतर 23° 23′ 22″ पर, पश्चिम से पूरब की और खींची गई काल्पनिक रेखा है। मकर रेखा के उत्तर में तथा कर्क रेखा के दक्षिण में स्थित क्षेत्र उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्र कहलाता है। 22 दिसम्बर को सूर्य जब मकर रेखा पर लम्बवत चमकता है तो उसके बाद वह उत्तरायण गति करने लगता है। मकर संक्रांति के दिन यह पूर्णत: उत्तरायण हो जाता है।

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