4 अप्रैल 1905, जब हिमाचल नें देखा महांप्रलय….
April 4th, 2020 | Post by :- | 209 Views

4 अप्रैल 1905 का बो दिन जब अभी लोग ठीक से जागे भी नहीं थे कि मौत नें तांडव मचा दिया। सुबह 6 बजकर 19 मिनट पर महज चंद सेकेंड की कंपन ने ही इस क्षेत्र के करीब 20 हजार लोगों को मौत की नींद सुला द‍िया था। कई ऐत‍िहास‍िक भवनों का नामोन‍िशां म‍िट गया था। मौत के सन्‍नाटे व अनहोनी की आशंका के अलावा यहां कुछ नहीं बचा था। जहां बेहतर भव‍िष्‍य की उम्‍मीदे जगमगाती थी वहां उदासी में लिपटी तबाही ही तबाही नजर आ रही थी। एक भी मकान ऐसा नहीं बचा जिसे इस प्रलयकारी कंपन नें रहने लायक छोड़ा हो। यहां पहली बार 7.8 मैग्‍नीच्‍यूड का भूकंप का झटका महसूस क‍िया गया था।उस समय यहां की आबादी भी कम थी और शह‍रों का आकार भी, बावजूद इसके उस समय भी इस भूकंप में मरने वालों का आंकड़ा 19 हजार 800 पहुंच गया। एक लाख भवन तबाह हो गए।

इस भूकंप ने कुल्लू-मनाली से लेकर शिमला, सिरमौर तक अपनी विनाशलीला दिखाई थी। इस भूकंप में यहां के पुराने मंद‍िर भी ध्‍वस्‍त हो गए थे। केवल बैजनाथ श‍िव मंद‍िर को अंश‍िक रूप से नुकसान पहुंचा था। कांगड़ा के इत‍िहास को बताने वाला कांगड़ा व नूरपुर के व‍िशाल क‍िले भी तबाह हो गए थे। यहां प्रमुख नगर कांगड़ा, धर्मशाला, मैक्‍लोडगंज व पालमपुर पूरी तरह से तबाह हो गए थे। इस भूकंप में कई अध‍िकारी भी मौत का ग्रास बन गए थे। बचे हुए लोगों में पुलिस अधीक्षक मिस्टर होमन भी शामिल थे। उन्होंने विशेष वाहक के साथ मदद के ल‍िए एक संदेश तत्‍कालीन आलाध‍िकार‍ियों को भेजा था। उस वक्त कांगड़ा जालंधर डिवीजन का भाग था। यहां हुई तबाही को लेकर तुरंत लाहौर से मदद भेजी गई थी।

कांगड़ा के भूतपूर्व जिलाधीश मिस्टर यंग हस्वैंड लाहौर में कमिश्नर पद पर थे, वह सहायता पार्टी के साथ आए। सहायता सामान और अधिकारियों की एक विशेष रेलगाड़ी पठानकोट भेजी गई। इसी बीच बचे हुए भारतीय और यूरोपीय लोगों ने संगठित होकर राहत कार्य किया। मलबे के नीचे दबे लोगों को जीवित बचाया गया। 7 अप्रैल को शाहपुर तक सामान पहुंच गया। तब टांगों पर ही सामान ढोया जाता था, ऐसे में गमदद लेकर आए टांगे 13 अप्रैल को धर्मशाला पहुंच गए परंतु कोतवाली बाजार और सिविल लाइंस की 2 मील की दूरी तय करने में टांगों को 2 दिन का वक्त लगा।
इस भीषण भूकंप में जिले में जान-माल सहित कई भवन क्षतिग्रस्त हुए थे और दो भवन सुरक्षित रह गए थे। इन दोनों भवनों को यह भीषण भूकंप जरा सा भी नहीं हिला पाया था। इन भवनों में एक जिला कांगड़ा में अंग्रेजों द्वारा निर्मित ट्रेजरी कार्यालय और दूसरा मंदिर था। ये दोनों इमारतें न तो गिरीं और न ही इनमें कोई दरार तक आई।

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