शादी के बाद माँ-बाप के साथ रहना चाहते हैं पुरुष, महिलाओं की पसन्द सिर्फ पति #news4
December 8th, 2021 | Post by :- | 143 Views

हाल ही में शादी.कॉम ने एक सर्वे कराया। इस सर्वे में यह जानकारी माँगी गई कि शादी के बाद युवा किसके साथ रहना चाहते हैं। सर्वे में अलग-अलग शहरों के कुल 3,952 पुरुष और 4,617 युवतियों से बातचीत के जरिए उनकी पसन्द-नापसन्द पूछी गई है। इस सर्वे का जो परिणाम सामने आया है वह बेहद चौंकाने वाला रहा है। 4,617 युवतियों में से 64 प्रतिशत से ज्यादा युवतियों का स्पष्ट कहना था कि वे शादी के बाद सिर्फ अपने पति के साथ रहना पसन्द करेंगी न कि संयुक्त परिवार में। संयुक्त परिवार से उनका तात्पर्य पति के माँ-बाप, भाई-बहन से था। हालांकि इस सर्वे में शामिल कुछ युवतियों का यह भी कहना था कि जिस तरह से पति का परिवार उनकी जिम्मेदारी है, वैसे ही पत्नी का मायका भी पति की जिम्मेदारी है। सिर्फ महिलाओं को यह कहा जाता है कि ससुराल वालों का ध्यान रखो, उनकी सेवा करो जैसा वे कहें वैसा करो। लेकिन पत्नी के मायके वालों की तरफ पति का कोई ध्यान या जिम्मेदारी नहीं होती है।
वहीं सर्वे में शामिल 3,952 पुरुषों में से 54 प्रतिशत से ज्यादा प्रतिभागियों का साफ कहना था कि वे शादी के बाद अपनी पत्नी सहित, अपने माता-पिता के पास रहना पसन्द करेंगे। उन्होंने इसकी कई वजहें भी गिनाई। इसमें फैमिली सपोर्ट और बच्चे होने के बाद बुजुर्ग और अनुभवी माता-पिता से मिलने वाली मदद सबसे बड़े कारण थे।

देखा जाए तो युवतियों का कहना भी गलत नहीं था। घर आई बहू से सभी को बहुत अपेक्षाएँ होती हैं। पुत्र की शादी के बाद अक्सर परिवार की महत्त्वाकांक्षाएँ अपनी बहू के प्रति बहुत ज्यादा बढ़ जाती हैं। परिवार वालों की तरफ से यह नहीं सोचा जाता कि जिसने अपनी जिन्दगी के 22-25 वर्ष एक परिवार में बिताए हैं वह अब दूसरे घर की जिम्मेदारी लेने जा रही है तो उसे वैसा ही माहौल दिया जाए जैसा वो अपने मायके में देखती आई है। लेकिन ऐसा बहुत कम घरों में देखा जाता है जहाँ बहू को बहू के रूप में नहीं अपितु घर की बेटी के रूप में स्वीकारा जाता है। जहाँ बहू को बेटी के रूप में स्वीकार कर लिया जाता है, वह घर खुशहाल और सम्पन्न नजर आता है और जिन घरों में बहू से ज्यादा तवज्जो अपने पुत्र और पुत्री को दी जाती है, वहाँ हमेशा कलह का वातावरण नजर आता है। परिणाम थक-हार के परिवार टूट जाता है।

मैं आपको अपना अनुभव बताता हूँ। मेरे माँ-बाप ने कभी भी बहुओं को वो मान-सम्मान नहीं दिया जिसकी वो हकदार हैं। उन्होंने पूरी जिन्दगी अपनी बेटियों को ही सर्वोपरि माना। बेटियों की दखलंदाजी के चलते ही हमारा पूरा परिवार तिनके की तरह बिखर गया। ऐसा नहीं है कि इसमें सारी गलती हमारे माँ-बाप की रही है, अपितु इसमें हमने भी सहयोग किया। हमने कभी यह नहीं सोचा कि जो लडक़ी 25 साल अपने एक ही घर में बिताकर उसे छोड़ हमारे साथ आई हमें उसके साथ किस तरह का व्यवहार करना चाहिए।

दूसरा उदाहरण मैं आपको अपने दो पड़ोसियों का देता हूँ, जो पिछले 45 साल से हमारे पड़ोस में रह रहे हैं। इन दोनों परिवारों में दो-दो पुत्र हैं। एक परिवार के दोनों भाईयों की शादी एक ही परिवार की दो लड़कियों से हुई और दूसरे परिवार के दोनों भाईयों की शादी अलग-अलग परिवारों की बेटियों से हुई। लेकिन दोनों पड़ोसियों के परिवारों में जो एकता देखने को मिलती है, उसकी मिसाल पूरी कॉलोनी देती है। मैंने पिछले 45 साल में कभी उनके परिवारों में तू-तू, मैं-मैं होते नहीं देखी।
कहने का तात्पर्य यह है कि शोध से जो नकारात्मक निष्कर्ष सामने आया है उसे सकारात्मक किया जा सकता है, लेकिन यह तभी सम्भव है जब पुरुष परिवार अपनी विचारधारा को बदलेगा।

कृपया अपनी खबरें, सूचनाएं या फिर शिकायतें सीधे news4himachal@gmail.com पर भेजें। इस वेबसाइट पर प्रकाशित लेख लेखकों, ब्लॉगरों और संवाद सूत्रों के निजी विचार हैं। मीडिया के हर पहलू को जनता के दरबार में ला खड़ा करने के लिए यह एक सार्वजनिक मंच है।