सार्वजनिक रूप से अपमानित होने पर मर जाती हैं बच्चों की भावनाएँ, टूटता है भरोसा #news4
December 8th, 2021 | Post by :- | 148 Views

अक्सर आप लोगों ने देखा होगा कि माँ-बाप अपने बच्चों को उनकी हर छोटी-बड़ी गलती के लिए डाँटते रहते हैं। इस कार्य को करते वक्त माँ-बाप यह तक भूल जाते हैं कि वह अपने बच्चे को दूसरे व्यक्तियों के सामने इस तरह से डाँट रहे हैं। माँ-बाप द्वारा अपने प्रति किए गए इस तरह के व्यवहार से बच्चे न सिर्फ आहत होते हैं अपितु वे अन्दर से टूट भी जाते हैं। उन्हें ऐसा महसूस होने लगता है कि उनका अपना कोई वजूद ही नहीं है। सार्वजनिक तौर पर बच्चों को डाँटने से उनके मानसिक स्वास्थ्य और क्षमताओं पर बुरा असर पड़ता है। कई ऐसे उदाहरण देखने को मिल जाते हैं जहाँ बच्चे माँ-बाप की इस हरकत के चलते स्वयं को असुरक्षित व दबा हुआ महसूस करने लगते हैं। इससे बच्चे का वो विकास नहीं हो पाता जो प्राकृतिक तौर पर होता है।

बच्चों में नहीं होता आत्मसम्मान यह हमारी भूल है
हमें ऐसा महसूस होता है कि बच्चों में अपने मान-सम्मान की समझ नहीं होती है। यह सोच बिलकुल गलत है। इसी सोच के चलते हम बच्चों को सार्वजनिक तौर पर अपमानित करते हैं। इस मामले में डॉक्टरों का कहना है कि आमतौर पर 3-4 साल की उम्र का होने तक बच्चों में आत्मसम्मान की भावना आनी शुरू हो जाती है। एक बार आत्मसम्मान की भावना आ जाने पर जब भी आप उन्हें सार्वजनिक रूप से किसी काम का दोषी ठहराते हैं, बुरा कहते हैं, डांटते हैं या मारते हैं, तो उन्हें मार से ज्यादा दुख अपनी बेइज्जती का होता है। इस वाक्ये को बार-बार दोहराया जाता है तो बच्चे आत्मसम्मान की कमी महसूस करने लगते हैं। इसलिए बच्चों को सार्वजनिक रूप से डाँटना, मारना, चिल्लाना नहीं चाहिए।

टूटता है माँ-बाप का भरोसा
बच्चों से माँ-बाप का रिश्ता गहरा होता है। यह रिश्ता आपसी भरोसे पर टिका होता है। जहाँ बच्चे को महसूस होता है कि यदि वह कहीं गलत होगा तो माँ-बाप उसका साथ देंगे। यह भरोसा ही बच्चे को माँ-बाप के साथ जोडक़र रखता है। यह भरोसा वक्त के साथ पैदा होता है। लेकिन जब कोई व्यक्ति बच्चों को सार्वजनिक रूप से डांटता, चिल्लाता या मारता है, तो इससे उस व्यक्ति के प्रति बच्चे का भरोसा टूटता है। ऐसे बच्चों के मन में यह बात आती है कि उनके अभिभावक उनकी इज्जत नहीं करते हैं।

बढ़ती है बगावत की भावना
असंतोष की वजह से बगावत का जन्म होता है। बेइज्जती अपमान असंतोष का सबसे बड़ा कारण होता है। जब बच्चा यह महसूस करता है कि उसके माँ-बाप उसकी गलती पर दूसरों के सामने उसे बेइज्जत करेंगे तो इससे उनमें बगावत की भावना उभरने लगती है। इस बगावत का असर यह होता है कि बच्चा अपने माँ-बाप के खिलाफ खड़ा होने लग जाता है। उसके अन्दर अपने लिए कुछ करने की भावना का विकास होता है। अगर बच्चे डर के मारे फैसले के खिलाफ नहीं भी खड़े हो पाते हैं, तो वो दूसरे तरीकों से इसका बदला चुकाते हैं जैसे- झूठ बोलना, धोखा देना, बिना बताए काम करना, कई बार जानबूझकर गलत काम करना।

कमजोर बनते हैं बच्चे, मर जाती हैं भावनाएँ
जो बच्चे अपने माँ-बाप के इस तरह के व्यवहार के आदी हो जाते हैं उनकी भावनाएँ पूरी तरह से खत्म हो जाती हैं। एक वक्त ऐसा भी आता है जब उन पर इस तरह की बातों का कोई असर नहीं होता है। इसके साथ ही इसका सबसे बड़ा असर यह होता है कि बच्चा अपने माँ-बाप की इज्जत नहीं कर पाता है। साथ ही उसके मन में अपने माँ-बाप के प्रति जो भावनाएँ होनी चाहिए वह पूरी तरह से खत्म हो जाती हैं।

मानसिक क्षमताओं पर पड़ता है बुरा असर
अक्सर गुस्से में मां-बाप बच्चों को सबके सामने ही बुरा, गलत और खराब कहने लगते हैं। इस तरह की बातों से उन्हें लगता है कि बच्चे को गलती का एहसास होगा और वो सुधर जाएगा या गलती दोहराने से बचेगा। कुछ प्रतिशत तक ऐसा हो भी जाता है लेकिन वर्तमान में जो दिखायी दे रहा है उसको देखते हुए ऐसा कहा जा सकता है कि बच्चों को सार्वजनिक रूप से गलत, कमजोर, खराब कहने से उनके अवचेतन मन पर इसका बुरा असर पड़ता है। बार-बार कमजोर कहने से बच्चा सच में कमजोर हो जाता है, बार-बार चोर कहने से बच्चा सच में चोरी करने लगता है। इससे बच्चे की मानसिक क्षमताओं जैसे- याद करने, एकाग्रचित्त होने, सोचने और समझने की क्षमता पर भी बुरा असर पड़ता है।

कृपया अपनी खबरें, सूचनाएं या फिर शिकायतें सीधे news4himachal@gmail.com पर भेजें। इस वेबसाइट पर प्रकाशित लेख लेखकों, ब्लॉगरों और संवाद सूत्रों के निजी विचार हैं। मीडिया के हर पहलू को जनता के दरबार में ला खड़ा करने के लिए यह एक सार्वजनिक मंच है।