तारकोल का स्याह सच…?
November 5th, 2019 | Post by :- | 160 Views

तारकोल का स्याह सच…?
प्रदेश भर में देखा जाता है कि लोक निर्माण विभाग के कार्यों में जैसे ही तारकोल डाला जाता है, वह उखड़ जाता है। लेकिन आखिर ऐसा होता क्यों है …?
तो इसका सच हम आपको बताते हैं..
वास्तव में बह तारकोल होता ही नहीं.. लेकिन यह बात सिर्फ ठेकेदार और विभाग के बड़े अधिकारी ही जानते हैं। तारकोल की तरह दिखने बाले यह ड्रम, प्राइमर के होते हैं। इस प्राइमर को, तारकोल करने बाली सतह पर छिड़काव के जरिए फैलाया जाना होता है। यह तारकोल के मुकाबले, बेहद सस्ता होता है।
लेकिन जेई और एसडीओ की मिलीभगत से, ठेकेदार इसी प्राइमर को तारकोल की तरह प्रयोग कर लेते हैं। प्राइमर को ही बजरी में मिलाकर गड्ढों में भर दिया जाता है, जो कुछ ही दिनों में उखड़ जाता है। क्योंकि प्राइमर तो गड्ढों को भरने के लिए होता ही नहीं है।
ऐसे में जब भी आपके आसपास कोई सड़क पक्की हो रही हो, तो जरूर देखें, कि ड्रम तारकोल “Bitumen” के ही हैं, या कहीं “Primer adhesive” से ही तो काम नहीं चलाया जा रहा है।
बाद में अगर सड़क उखड़ जाती है, तो जांच का नाटक किया जाता है, जबकि यही दोनो अधिकारी इस जांच को करते हैं।
फिलहाल कार्रवाई ठेकेदारों पर ही नहीं, जेई, एसडीओ पर भी हो, तब काम कुछ सही हो सकता है।

कृपया अपनी खबरें, सूचनाएं या फिर शिकायतें सीधे news4himachal@gmail.com पर भेजें। इस वेबसाइट पर प्रकाशित लेख लेखकों, ब्लॉगरों और संवाद सूत्रों के निजी विचार हैं। मीडिया के हर पहलू को जनता के दरबार में ला खड़ा करने के लिए यह एक सार्वजनिक मंच है।