सिंगल चाइल्ड से जुड़े पांच मिथक
January 6th, 2023 | Post by :- | 51 Views
समाज में पारंपरिक रूप से सिंगल चाइल्ड यानी इकलौते बच्चे को लेकर कई सारी ग़लतफ़हमियां व्याप्त हैं. ऐसा माना जाता है कि इकलौते बच्चे अकेले पड़ जाते हैं, वे स्वार्थी होते हैं, चिंतित होते हैं और कुछ तो बिगड़े होते हैं. पर जब आप अपने आसपास के इकलौते बच्चों को देखेंगे तो पाएंगे कि वे अपने बारे में समाज में बनी पूर्वधारणाओं की तरह नहीं होते. उनके अच्छे या बुरे होने की संभावना उतनी ही होती है, जितने भाईयों-बहनों के साथ पल-बढ़ रहे दूसरे बच्चों की होती है. आइए हम एकल बच्चों से जुड़ी पांच कॉमन ग़लतफ़हमियों पर नज़र डालते हैं.

पहली ग़लतफ़हमी: वे अकेले पड़ जाते हैं 

इकलौते बच्चों के बारे में यह सबसे आम ग़लतफ़हमी है. जबकि अकेले पड़ने की सच्चाई यह कि हममें से हर कोई जीवन में कभी न कभी, अकेलेपन का सामना ज़रूर करता है. इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि आप कितने सारे लोगों से घिरे हुए हैं. अब हाल का ही उदाहरण ले लें तो लॉकडाउन के दौरान हम अपने-अपने परिवारों के साथ रहते हुए भी अकेलेपन का शिकार हुए थे. आमतौर पर इकलौते और अकेले में बहुत फ़र्क़ होता है, जिसे लोग समझ नहीं पाते हैं. यही कारण है कि इकलौते बच्चे को देखकर लोग उसे अकेला समझने लगते हैं. उस बच्चे के माता-पिता, दोस्त, रिश्तेदार आगे चलकर जीवनसाथी और अपने ख़ुद के बच्चे भी तो होंगे. वह अकेला कैसे पड़ेगा?

दूसरी ग़लतफ़हमी: उनका स्वभाव उग्र होता है, वे हुक़ुम चलाते हैं 

किसी के स्वभाव के उग्र या बॉसी होने के पीछे उसका इकलौता होना कारण नहीं होता, बल्कि कारण यह होता है कि उनकी परवरिश कैसी की जाती है. आपका चाहे एक बच्चा हो या एक से ज़्यादा बच्चे, उन्हें शांत, संयमित रहना और दूसरों का सम्मान करना जैसे सामान्य शिष्टाचार सिखाएं. बच्चे को अपनी बात को, ख़ासकर असहमति को शालीनता से व्यक्त करना सिखाना, पैरेंट्स का काम है. वे ग़लत कर रहे हों तो उन्हें टोकें. अपने व्यवहार को भी वैसा ही रखें, जैसा व्यवहार बच्चे से एक्सपेक्ट करते हों. उनके दोस्तों यानी वे कैसे लोगों के साथ रहते हैं, उसपर अपनी नज़र बनाए रखें. बच्चा अकेला हो या भाई-बहनों वाला, इन सावधानियों के साथ वह शिष्ट बनेगा.

तीसरी ग़लतफ़हमी: वे बुरी तरह अपने अभिभावकों पर निर्भर होते हैं 

लोगों की मानें तो इकलौते बच्चे अपने पैरेंट्स पर इमोशनली और फ़िज़िकली कुछ ज़्यादा ही डिपेंड होते हैं. चूंकि उनके कोई भाई-बहन नहीं होते हैं, उन्हें अपनी समस्याओं से ख़ुद निपटना होता है, जहां बाहरी मदद की ज़रूरत होती है, पैरेंट्स ही उनके एकमात्र सहारा होते हैं. अब इसमें ग़लत क्या है? कई मायनों में देखा जाए तो समस्याओं का सामना अकेले करते-करते वे आत्मनिर्भर बनते हैं. पैरेंट्स के साथ उनका भावनात्मक लगाव ज़्यादा होता है. हममें से हर कोई जीवन के शुरुआती दौर में अभिभावकों पर निर्भर होते ही हैं. आगे चलकर दोस्त सुख-दुख साझा करने, सहयोग व सहारा देने आ जाते हैं.

चौथी ग़लतफ़हमी: इकलौते बच्चों को मैच्योर होने में ज़्यादा समय लगता है 

लोगों को लगता है कि इकलौते बच्चे को चूंकि लाड़-प्यार ज़्यादा मिलता है तो उनका बचपना लंबे समय तक बना रहता है. वे जल्दी मैच्योर नहीं हो पाते. पर सच्चाई यह है कि ज़्यादातर इकलौते बच्चे उन बच्चों की तुलना में, जो भाई या बहन के साथ पलते-बढ़ते हैं, से जल्दी परिपक्व होते हैं. वे अपने माता-पिता की मदद ज़्यादा करते हैं. उनपर ज़िम्मेदारियां जल्दी और ज़्यादा आती हैं तो वे दुनियादारी जल्दी सीखते हैं. वैसे परिपक्वता के बारे में सच तो यह है कि मैच्योर होना व्यक्ति-व्यक्ति पर निर्भर होता है. इसका आकलन सिंगल या भाई-बहनों के साथ पल-बढ़ रहे बच्चा होने के पैमाने पर करना ग़लत है.

पांचवीं ग़लतफ़हमी: वे ज़रूरत से ज़्यादा संवेदनशील होते हैं

यह भी चीज़ों को जनरलाइज़ करने वाली बात हुई. यह कहना कि इकलौते बच्चे जल्दी आहत हो जाते हैं, पूरी तरह से सही नहीं है. हां, इतना ज़रूर है कि वे चूंकि भाइयों-बहनों के साथ लड़ते-झगड़ते बड़े नहीं होते, उन्हें सिबलिंग राइवलरी जैसे अनूठे अनुभवों से वंचित रहना पड़ता है. वे कुछ हद तक यह नहीं जानते कि झगड़े के बाद भी प्यार बना रह सकता है. पर इसका पॉज़िटिव साइड यह है कि वे दूसरों की भावनाओं का ख़्याल रखते हैं. वे किसी को ऐसा कुछ नहीं कहते, जिससे वह व्यक्ति दुखी हो जाए. वे भले ही भाई-बहन के साथ होने के सुख से वंचित रहते हैं, पर उन्हें माता-पिता का प्यार ज़्यादा मिलता है. पैरेंट्स के साथ उनका बॉन्ड ज़्यादा मज़बूत होता है.

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