गणेश अनादि हैं, वे दुनियाभर में 5000 साल पहले से ही पूजे जा रहे हैं
September 2nd, 2019 | Post by :- | 200 Views

गणेश अनादि हैं। इतिहास में भी इसके साक्ष्य हैं। उनकी पूजा के प्रमाण आज से 5000 साल पहले से मिलने लगते हैं। वे अलग-अलग रूपों में विभिन्न संस्कृतियों में हैं। जापान में उन्हें कांगीतेन कहा जाता है। चीन, अफगानिस्तान, ईरान, और मैक्सिको की माया संस्कृति तक में उनकी मूर्तियां मिली हैं।

  • ईरान के लोरिस्तान प्रांत में 3200 साल पुरानी मेटल प्लेट पर गणेश प्रतिमा मिली है

माइथोलॉजी और सिम्बॉलिज्म के विशेषज्ञ लायर्ड स्क्रैन्टन की किताब ‘प्वाइंट ऑफ ओरिजनः गोओबलकी टिपे एंड स्पिरिचुयल मैट्रिक्स फॉर द वर्ल्ड कॉस्मोलॉजी’ के अनुसार ईसा पूर्व 3000 में गणेश पूजा का उल्लेख मिलने लगता है। सिंधु घाटी और हड़प्पा सभ्यता में भी गणेश प्रतिमा मिली थी। वहीं ईरान के लोरिस्तान में 1200 साल ईसा पूर्व की गणेश प्रतिमा मिली है।

  • अफगानिस्तान के राजा खिंगाल ने 5वीं सदी में गणेशजी की मूर्ति को स्थापित किया था

राबर्ट ब्राउन की किताब ‘गणेशः स्टडीज ऑफ एन एशियन गॉड’ के मुताबिक अफगानिस्तान के उत्तरी काबुल में गणेश की एक प्रतिमा चौथी सदी की मिली है। वहीं पख्तिया प्रांत के गार्देज शहर में एक प्रतिमा 5वीं सदी की पाई गई। संगमरमर की इस मूर्ति पर दर्ज है- ‘ये मनमोहक प्रतिमा महाविनायक की है, जिसे शाही राजा खिंगाल ने स्थापित कराया था।’

  • चीन के मोगाओ गुफा में 1400 और जापान में 1200 साल पुरानी गणेश पेंटिंग मिली है

चीन के मोगाओ गुफा में भी गणेश की छठी शताब्दी की पेटिंग मिलती है। यह बौद्ध गुफा है। इसमें बौद्ध धर्म से संबंधित हजारों चित्र हैं। इस गुफा के 25 किमी के दायरे में 492 मंदिर हैं। माना जाता है कि बौद्ध धर्म ने ही यहां गणेश पूजा शुरू की। चीन से ही गणपति जापान भी पहुंचे। यही वजह है कि जापान में 1200 साल पुरानी गणेश प्रतिमा और चित्र मिले हैं।

  • तमिल में गणेश पिल्लै हैं, तेलुगु में विनायाकुडू

तमिल में गणेशजी को विनायागार और पिल्लै भी कहा जाता है। तेलुगु में उनका नाम विनायाकुडू है। बर्मा में उन्हें पाली महा विनायक, थाइलैंड में फरा फिकानेत कहते हैं। गणेशजी की पूजा बौद्ध धर्म में भी होती है। गणेश पुराण के अनुसार इंसान के शरीर का मूलाधार चक्र गणेश कहलाता है। शिव महापुराण के अनुसार गणेशजी का रंग हरा और लाल है।

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