बाग़ी बच्चों को कैसे संभालें? #news4
October 23rd, 2022 | Post by :- | 66 Views

टीनएजर बच्चों को संभालना बच्चों का खेल नहीं है. अब तक जो बच्चे नटखट, चुलबुले और प्यारे लगते थे, अचानक से अजीबोग़रीब लगने लगते हैं. वे न केवल ख़ुद को बड़ा समझनेवाला एटिट्यूड दिखाते हैं, बल्कि बड़ों का मज़ाक उड़ाना, उनका निरादर करना भी उनके स्वाभाव में शामिल हो जाता है. बात तब हाथ से निकलती लगती है, जब वे बात-बात पर बहस और ग़ुस्सा करने लगते हैं. आपको समझ आने लगता है कि अब वे उस उम्र के नहीं रहे, जब उन्हें डांट-फटकार कर चुप कराया जा सके. यौवनावस्था में क़दम रखते ही बच्चे बाग़ी होने लगते हैं. उन्हें हर चीज़ से शिकायत होती है. ज़ाहिर है आपसे यानी अपने मां-बाप से भी शिकायत होगी. आइए जानें, इन शिकायती बच्चों को कैसे संभाला जा सकता है.

टीनएजर बच्चों को समझें 
अपने टीनएजर बच्चे का बुरा बर्ताव या हमेशा क्रोध में रहना आपका तक़लीफ़ पहुंचा सकता है. पर उनके ग़ुस्से को अपने ग़ुस्से से हैंडल करना समझदारी भरी बात नहीं है. चूंकि आप समझदार हैं और ख़ुद ऐसे दौर से गुज़र चुके हैं आपको अपना दिमाग़ शांत रखना होगा और उनके ग़ुस्से को तार्किक ढंग से समझने की कोशिश करना होगा. आपको अपनी भावनाओं पर क़ाबू पाना होगा. देखिए बच्चों के व्यवहार में आनेवाला अचानक बदलाव यह साबित करता है कि अब वे बच्चे नहीं रहे. उनमें शारीरिक और मानसिक बदलाव आ रहे हैं. उनपर पढ़ाई लिखाई और करियर की चिंता हावी होने लगी है. अब वे आपसे ज़्यादा अपने दोस्तों से सीखते हैं. बेशक बच्चों का बुरा बर्ताव सहन नहीं करना चाहिए, पर अभी इस बात की ज़रूरत है कि आप धैर्य रखें और उन्हें समझने की कोशिश करें.

अच्छा उदाहरण पेश करें 
आप इतने सालों की पैरेंटिंग में यह बात तो समझ ही गए होंगे कि बच्चे उदाहरणों से ही सीखते हैं. भले ही वे अपना ख़ुद का व्यक्तित्व विकसित कर रहे हों, पर वे जाने-अनजाने सीखते आपसे ही हैं. तो उनके साथ आपको बड़ा ही संयमित और दोस्ताना व्यवहार रखना है. अगर आप उन्हें बात-बात पर चिल्लाएंगे तो किसी दिन वे पलटकर जवाब दे दें तो आपको आश्चर्य नहीं होना चाहिए. उनके साथ अभी का आपका उग्र व्यवहार उन्हें बतौर टीनएजर हिंसक बना सकता है. उनकी बातें आपको भले ही बुरी और ग़लत लगें पर उसका जवाब क्रोध में देने के बजाय उन्हें पास बिठाकर शांत दिमाग़ से समझाएं. उनके साथ विभिन्न मुद्दों पर तर्क-वितर्क करें. ऐसा नहीं होगा कि हमेशा आपका नज़रिया ही सही होगा. हो सकता है कि आपको भी उनकी कुछ बातें बेहद तार्किक लगें. जब बच्चे पैरेंट्स के साथ लॉजिकल बातें करते हैं तब उनका सामाजिक विकास भी होता है. वे समाज में लोगों से बात करने, अपनी बात को तर्कों के साथ रखने की कला सीखते हैं. वे दूसरों की बातों और नज़रिए का भी सम्मान करना सीखते हैं. पुरानी कहावत है कि बच्चा इसलिए बाग़ी बनता है क्योंकि उसे लगता है कि घर और समाज में उसे गंभीरता से नहीं लिया जाता है.

बच्चों को पूरी छूट देना भी सही नहीं है
किशोरावस्था में बच्चों में आनेवाले बदलावों को लेकर कुछ पैरेंट्स इतने ज़्यादा मेंटली प्रिपेयर्ड होते हैं कि वे बच्चों में आ रहे बदलावों को सामान्य मानकर उनकी ओर ध्यान ही नहीं देते. उन्हें उनकी समस्याओं से जूझने, उन समस्याओं से बाहर निकलने के लिए उन्हें अकेला छोड़ देते हैं. ऐसा करना बहुत ज़्यादा ख़तरनाक साबित हो सकता है. वे ग़लत राह पर जा सकते हैं. बेशक टोका-टोकी पर बच्चे के साथ आपके संबंध थोड़े खटास भरे हो सकते हैं, उन्हें बेलगाम छोड़ देने के ख़तरे कहीं ज़्यादा हैं. आपको उनकी ज़िंदगी में हस्तक्षेप करना ही होगा. उनके लिए कुछ नियम बनाने ही होंगे. यह सुनिश्चित करना ही होगा कि बच्चे उन नियमों का पालन करें. आख़िरकार बच्चे कितने भी बड़े क्यों न हो रहे हों, वे आपके तो बच्चे ही हैं. उनका ख़्याल रखना आपकी ज़िम्मेदारी है.

उनके साथ-साथ उनकी संगत पर भी नज़र रखें
हम जिनके साथ रहते हैं, उनके जैसे बनते हैं. यह बात कोई नई नहीं है. बतौर पैरेंट हमें इस बात को हमेशा याद रखना चाहिए. आपका टीनएजर बच्चा किन दोस्तों के साथ रहता है आपको पता होना चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि बच्चों की बिगड़ने की उम्र टीनएज ही होती है. आपको समय-समय पर उनके दोस्तों को घर बुलाना चाहिए. बाहर भी उनसे मिलना चाहिए. उनके दोस्तों के पैरेंट्स से भी आपकी बातचीत होती रहे तो सोने पर सुहागा. उनके स्कूल और कोचिंग के टीचर्स से मिलते रहें. इस तरह आप बच्चों के किसी ग़लत संगत या आदत के दलदल में पड़ने से बचा सकते हैं. आपको यह भी पता होगा कि कहीं उसके दोस्त उसे बुली तो नहीं कर रहे हैं. ज़ाहिर है, अपनी पर्सनल ज़िंदगी में आपकी इतनी ज़्यादा दख़लअंदाज़ी बच्चे को अच्छी नहीं लगेगी, पर बतौर पैरेंट आपके पास कोई और चारा नहीं है.

उन्हें लेक्चर न दें, बल्कि तारीफ़ करें
जब बच्चे किसी काम में असफल हों या किसी बात को लेकर दुखी हों तो उन्हें लेक्चर देने से बचना चाहिए, ऐसा करके आप उनके मन में अपने लिए दूरी ही बनाते हैं. उन्हें ऐसा लगने लगता है कि मम्मी-पापा मेरी भावनाओं को समझने ही नहीं हैं. हर बात में अपने बचपन या स्कूल-कॉलेज के दिनों का उदाहरण देना ठीक नहीं है. आपके स्कूल-कॉलेज के ज़माने से उनकी दुनिया काफ़ी अलग है. आप मानें या न मानें आपकी तुलना में आपके बच्चे अपने टीनएज में काफ़ी स्मार्ट हैं. उन्हें हौसला, हिम्मत और तारीफ़ चाहिए होता है, ज्ञान तो गूगल पर भी उपलब्ध है. आप उन्हें सही रास्ते पर, सही तरीक़े से आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करें. आप देखेंगे कि आपका बाग़ी बच्चा धीरे-धीरे समझदार और लक्ष्य हासिल करने के लिए प्रेरित युवा में तब्दील हो जाएगा.

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