काश… कोई इनके आंसू देख पाता
February 6th, 2020 | Post by :- | 177 Views

शहरीकरण के साथ साथ सोच का भी कंकरीटात्मक होना इसी को कहा जा सकता है। आजकल शादी ब्याह और पार्टियों में इन बेचारों को इस प्रकार प्रस्तुत करने का फैशन सा हो चला है। इवेंट मैनेजरों से हाथ जोड़ कर प्रार्थना है कि इस प्रकार चंद पैसा देने के खातिर इन असहाय गरीबो को इस तरह कष्ट देकर मजाक न बनाए..?
ये गरीब भाई इस ठण्ड में बिना कपडे के कुछ चंद रूपयों के खातिर एक शादी समारोह में दरबान बना खड़ा थर थर काँप रहा था और इंसानियत के हत्यारे सेल्फी ले रहे थे और कुछ तो उसे गुदगुदी दे रहे रहे थे… रोजगार दो कम से कम उम्र तो देखो सिर्फ मज़बूरी मत देखो
उफ्फ अमानविय कृत्य ! इसे ही कहते है मजबूरी का फायदा उठाना !
काश उनके आंसू भी कोई देख लेता !

हो सके तो ऐसे लोगो भी एक्सपोज़ करें जो गरीब का या गरीबी का ऐसे मज़ाक उड़ाते है। या चंद पैसों को बचाने के खातिर उनके स्वाभिमान से खिलवाड़ करते हैं।

विदेशों की अंधाधुंध नकल ने एक और नई प्रथा को जन्म दिया है। वह यह कि जब कभी आप किसी बड़े मॉल में जाकर देखेंगे तो सहसा आपकी नजर जब सेल्समैन पर पड़ेगी तो देखिएगा कि जब उसके पास कोई ग्राहक नहीं आएगा तब भी उसे सीधे खड़े ही रहना पड़ेगा। उसके आसपास बैठने के लिए कोई स्टूल या कुर्सी नहीं होती। वह 12 से 14 घंटे सिर्फ खड़ा ही रहता है। आखिर यह भी कैसी कॉरपोरेट कल्चर है । जो एक जरूरतमंद व्यक्ति की मजबूरी के साथ घिनौना मजाक नहीं तो फिर क्या है।

आधुनिकतम बनो समय के साथ चलो विज्ञान को मानो ।
लेकिन संवेदनहीन ना बनो।

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