अगर गुस्सा आपका स्वभाव बनता जा रहा है तो कैसे इसे रोका जा सकता है
June 14th, 2019 | Post by :- | 185 Views

कारपोरेट कल्चर और कॉम्पीटिशन के दौर में व्यक्ति का स्वभाव बदलता जा रहा है। हम अपने स्वभाव से अलग एक अभिनेता की तरह दुनिया के सामने आते जा रहे हैं। हमारे व्यवहार में स्वभाविकता कम और अभिनय अधिक होता है। अक्सर बाहरी दुनिया में किया गया अभिनय जैसा व्यवहार हमारे स्वभाव में उतरने लगता है। लोग दुनिया के सामने कुछ और होते हैं और अपने भीतर कुछ और। कई बार बाहरी दुनिया का तनाव हमारे भीतर तक उतर आता है। हमारा मूल स्वभाव कहीं खो जाता है। हम अपनेआप में नहीं रहते।

कई लोग गुस्से का अभिनय करते हैं, दफ्तर में, मित्रों में या सहयोगियों में, लेकिन वो गुस्सा कब खुद उनका स्वभाव बन जाता है वे समझ नहीं पाते। समय गुजरने के साथ ही व्यवहार बदलने लगता है। हमेशा प्रयास करें कि दुनियादारी की बातों में आपका अपना स्वभाव कहीं छूट ना जाए। आप जैसे हैं, अपनेआप को वैसा ही कैसे रखें, इस बात को समझने के लिए थोड़ा ध्यान में उतरना होगा।

हम कभी-कभी क्रोध करते हैं लेकिन क्रोध हमारा मूल स्वभाव नहीं है। क्या किया जाए कि बाहरी अभिनय हमारे भीतरी स्वभाव पर हावी ना हो। क्रोध पहले व्यवहार में आता है फिर हमारा स्वभाव बन जाता है। क्रोध स्वभाव में आया तो सबसे पहले वो हमारी सोच को खत्म करता है, फिर संवेदनाओं को मारता है। संवेदनाहीन मानव पशुवत हो जाता है।

इस क्रोध को अपने स्वभाव में उतरने से कैसे रोका जाए? बाहरी दुनिया को बाहर ही रहने दें। बाहरी दुनिया और भीतरी संसार के बीच थोड़ा अंतर होना चाहिए।

कुछ आदतें बदलें, कुछ नई आदतें अपनाएं

1 .  रोज ध्यान जरूर करें। थोड़ा सा भी मेडिटेशन हमें नई ऊर्जा से भरता है। हमें अपने आप से मिलने का अवसर देता है।

2 . अपने परिवार के साथ समय बिताएं। नियम बना लें कि आधे घंटे से एक घंटे का समय कम से कम ऐसा निकालेंगे जो पूरी तरह आपके परिवार के लिए हो।

3 . थोड़ा समय खुद के लिए निकालें। एकांत में बैठें। किसी मंदिर या प्राकृतिक स्थान के निकट बैठें। ये आपके लिए सकारात्मक ऊर्जा पाने और खुद का विश्लेषण करने के लिए बहुत उपयोगी होगा।

4 . अपने शौक को जीवित रखें। जो भी आपका रचनात्मक शौक हो, जैसे संगीत सुनना, किताबें, पढ़ना, कोई खेल खेलना, उसके लिए कुछ समय जरूर निकालें, रोज ना कर सकें तो सप्ताह में एक या दो बार जरूर करें।

भगवान कृष्ण सिखाते हैं हमेशा ऊर्जावान रहने का तरीका

महाभारत में भगवान श्रीकृष्ण को देखिए, संसार भर के काम किए लेकिन खुद के लिए समय निकालते हैं। गोकुल या वृंदावन में जब रहे, थोड़ा समय खुद को जरूर देते। अकेले वन में या यमुना किनारे बैठकर बांसुरी बजाते हैं। संगीत हमारी संवेदनाओं को सिंचता है। वे रोज नियम से ध्यान और पूजा किया करते थे। ध्यान उन्हें दृढ़ बनाता है। अपने लिए कुछ समय एकांत में चिंतन के लिए रखते थे। एकांत उन्हें नव-जीवन देता है। श्रीमद्भागवत में कई जगह उल्लेख आया है, जब भगवान कृष्ण अपने माता-पिता, भाई, पुत्र और पत्नियों के साथ पारिवारिक बातें करते और उनके साथ समय बिताते हैं। हम जब खुद को समय देंगे, खुद पर ध्यान देंगे तो फिर संसार का बाहरी आवरण, बाहर ही रहेगा। आप भीतर से वो ही रहेंगे जो आप हैं।

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