तीर न भी चलता, तकदीर तो संवर जाती…
March 5th, 2020 | Post by :- | 162 Views

संसदीय क्षेत्र में पालक के नाम पर कांगड़ा में बवाल उठ गया है। विवाद इस बात पर खड़ा हो गया है कि संगठन में कांगड़ा के नेताओं को क्यों हाशिये पर धकेला जा रहा है ? क्या कांगड़ा के नेता इस काबिल नहीं हैं कि वह संगठन में भूमिका न निभा सकें ? क्या उनमे यह काबलियत नहीं है कि वह अपने घर के काडर की सम्भाल कर सकें ?

दरअसल, कांगड़ा में जंग इसलिए छिड़ गई है कि कांगड़ा के हर उस नेता को पालक के पद काबिल भी नहीं समझा गया, जिन्होंने संगठन के एक इशारे पर या तो मौजूदा करिअर को अलविदा कह दिया या फिर उन्होंने कभी दर्द भी सांझा नहीं किया।

पालक के पद में हालांकि यह अघोषित क्राइटेरिया रहता है कि वह शुरुआती दौर से संगठन से जुड़ा हुआ हो । कभी पार्टी विरोधी गतिविधि तो दूर की बात, चूँ तक न की हो। मोटी नजर दौड़ाएं तो इस पद के लिए पूर्व राज्यसभा सांसद कृपाल परमार, मौजूदा लोकसभा सांसद किशन कपूर और डॉ राजीव भारद्वाज भी इस पद पर बिठाए जा सकते थे। कृपाल और भारद्वाज के नाम प्रदेशाध्यक्ष पद के लिए रेस में थे। किशन कपूर वो चेहरे हैं, जिन्होंने पार्टी के कहने पर मंत्री पद की ठसक को किनारे पर रख कर बिना कोई कसक जाहिर किए लोकसभा का रास्ता पकड़ लिया था।
हैरानी की बात है कि सीएम जयराम ठाकुर के गृह क्षेत्र में सांसद रामस्वरूप शर्मा को पालक बना दिया जाता है,पर कपूर को अनदेखा कर दिया जाता है। दो मंत्रियो विक्रम ठाकुर और राजीव सैजल को सरकार के साथ- साथ संगठन का भी जिम्मा सम्भाल दिया गया । काडर में हल्ला है कि संगठन-सरकार कब से एक हो गए ?
चाहिए तो यह था कि संगठन से ही चेहरे ढूंढे जाते और इनको मजबूत किया जाता। यह भी न हुआ । पर जो हुआ वह और भी घातक कर दिया गया । काडर में ही दबके का डर बना दिया गया। कहा जा रहा है कि अगर कांगड़ा के किसी स्थापित नेता को पालक बनाया जाता तो वह संगठन में बतौर पालक मजबूत हो जाता। आरोप लग रहे हैं कि यह कहीं कांगड़ा को लँगड़ा करने की कोशिश तो नहीं है ? यह भी कहा जा रहा है कि कांगड़ा से किसी नेता को पालक बनाने से भले ही चाहे कोई तीर नहीं चलता, पर फिलवक्त जो तकदीर बिगड़ रही है, वह संवर जरूर जाती…

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