कुलदीप अग्निहोत्री जाएंगे राज्यसभा ! …. दौड़ में दूसरे नम्बर पर महेंद्र पाण्डे
March 8th, 2020 | Post by :- | 200 Views

केंद्रीय विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर डॉ कुलदीप अग्निहोत्री राज्यसभा की दहलीज लांघने के करीब पहुंचते नजर आ रहे हैं । यह अलग बात है कि उनके साथ कभी हिमाचल भाजपा में “सर्व शक्तिमान” रहे महेंद्र पाण्डे भी इनके साथ बराबर दौड़ रहे हैं। अगर सब सही रहा तो डॉ अग्निहोत्री का अग्नि बाण इस लक्ष्य को भेदेगा और इसके असर से पहले से ही दहक रहा कांगड़ा और आग पकड़ लेगा। इसके आसार इस खबर के बाहर आते ही दिखने शुरू हो गए हैं।

सबसे ज्यादा बवाल भाजपा के उस काडर में उठ खड़ा हुआ है जो जनसंघ के जमाने से लेकर भाजपा के युग तक अंधाधुंध काम करता आ रहा है। अंदर की खबरें यह खुलासे कर रही हैं कि ज्वालामुखी धधक रहा है और कभी भी इसमें विस्फोट हो सकता है।

संगठन में झण्डे डंडे लगाने वाले कार्यकर्ताओं के बीच यह बवाल-सवाल खड़ा हो गया है कि आखिर उनकी एहमियत है क्या ? शिक्षाविद होना काबलियत है या फिर झंडाविद बनकर झंडा बुलंद करने वालों की कद्र होनी चाहिए ? वहीं सियासी माहिर भी इस खबर से खासे भौचक्क स्थिति में हैं। मगर इन माहिरों का एक कुनबा यह भी मान रहा है कि अगर ऐसा होता है तो कोई बड़ी बात नहीं होगी।

तर्क देते हुए यह कहते हैं कि दरअसल, भाजपा हाईकमान को राज्यसभा में प्रखर वक्ता चाहिएं। राज्यसभा में भाजपा के खाते से भले ही संख्याबल बढ़ा है, मगर मौके पर तर्क शक्ति का अभाव बन जाता है। ऐसे में डॉ अग्निहोत्री और पाण्डे साहब का इतिहास रहा है कि वह आला दर्जे के वक्ता हैं। ऐसे में पॉलिटिकल एसजस्टमेंट को जगह हाईकमान और आरएसएस इस कवायद को सिरे चढ़ा सकते हैं।

वहीं दूसरी तरफ हिमाचल भाजपा के कार्यकर्ताओं के अलावा एक ऐसा धड़ा भी है जो यह मान रहा है कि अगर पॉलिटिकल एन्ड पर ऐसा हुआ तो बहुत सारी परिस्थितियों पर छाए बादल छंट जाएंगे। साथ ही एक धड़ा यह भी मान रहा है कि ऐसा हुआ तो हाथ से निकल रहा कांगड़ा कमल के फूल से छिटक जाएगा।

सिलसिलेवार बात करें तो परिस्थितियों पर बादलों का जिक्र करने वाले नेताओं का कहना है कि अभी तक यह साफ नहीं हो पा रहा है कि आखिर सरकार और संगठन में चल किसकी रही है ? प्रदेश कार्यकारिणी में भी यह पता नहीं चल रहा कि यह किसकी पसंद की टीम है ? अगर यह फैसला भी उपरोक्त दोनों नामों में से होता है तो यह किसकी च्वाइस होंगे ?
वहीं इन हालात से फिक्रमंद तबके का यह मानना है कि कांगड़ा में जिस तरह अनदेखी के आरोप लग रहे हैं, उनमें यह मौका डैमेज को कंट्रोल करने वाला था। कायदे से अभी तो अधिकांश यही होता आया है कि राज्यसभा की जो सीट जिस जिले से खाली होती है, वहीं से अगला सांसद भेजा जाता है। पर कांगड़ा से हट रही विप्लव ठाकुर की बदली अगर बाहरी प्रदेश या जिले से की जाती है तो इसका काडर और आम मतदाता पर क्या असर होगा ?

खैर, अभी पिक्चर बाकि है। पर भाजपा में दर्शक बन कर रह जा रहे वरिष्ठ कार्यकर्ताओं में यह दर्द भरमौर से सिरमौर तक सांझा ही नजर आ रहा है….

Source: Darasal

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