हिमाचल प्रदेश के मंडी जिला के कुन्नू में चीड़ की पत्तियों से कोयला तैयार करने के लिए लगाई गई मशीनरी। #news4
May 30th, 2022 | Post by :- | 183 Views

प्रदेश में हर साल गर्मी के दौरान लोग वनों में अकसर चीड़ की पत्तियां व लैंटाना जलाते थे। इससे वन संपदा को भारी नुकसान होता था। पत्तियों से कोयला बनाने की तकनीक नहीं थी। आइआइटी मंडी के शोधार्थियों ने तीन साल पहले पत्तियों से कोयला बनाने की तकनीक विकसित की थी। इसके बाद प्रदेश के सात स्थानों पर संयंत्र लगे। प्रदेश सरकार ने इस तकनीक को अपनाया। वन विभाग के माध्यम से संयंत्र स्थापित करने के लिए सरकार 50 प्रतिशत अनुदान दे रही है। अनुदान मिलने से एक यूनिट यानी संयंत्र स्थापित करने में 12 लाख रुपये खर्च का रहा है।

वनों से चीड़ की पत्तियां एकत्र करने का काम महिला व युवक मंडलों को सौंप रखा है। इसके एवज में प्रति व्यक्ति 600 रुपये मेहनताना मिल रहा है। एक क्विंटल पत्तियों से 70 किलो कोयला तैयार हो रहा है। कोयले का सीमेंट संयंत्रों में प्रयोग हो रहा है। थर्मल पावर प्रोजेक्ट में कोयले के प्रयोग को लेकर प्रदेश सरकार व राष्ट्रीय ताप विद्युत निगम (एनटीपीसी) के बीच संवाद चल रहा है। दूसरे कोयले के मुकाबले चीड़ की पत्तियों से तैयार होने वाला कोयला मात्र 10 रुपये प्रति किलो मिलेगा।

वन में ही जला दिया जाता था लैंटाना: लैंटाना को काटने के बाद उसे वनों में ही जला दिया जाता था। इससे पर्यावरण को नुकसान पहुंचता था। अब लैंटाना की झाडिय़ों को उखाडऩे के बाद उन्हें एकत्र कर उद्योग तक पहुंचाया जा रहा है। उद्योगों में चीड़ की पत्तियों की तरह पहले झाडिय़ों का पाउडर बना फिर उसके ब्रिकेट्स (कोयला) तैयार किया जा रहा है।

एक वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में 120 टन चीड़ की पत्तियां: हिमाचल में 1,258,85 व उत्तराखंड में 3,99,329 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में चीड़ के वन हैं। एक वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में 120 टन तक चीड़ की पत्तियां एकत्र होती हैं। लैंटाना हिमाचल के 2355, जम्मू-कश्मीर व लद्दाख के 132 वर्ग किलोमीटर भूभाग में फैल चुका है।

क्या है कैलोरी: कैलोरी ऊष्मा या ताप को मापने की इकाई है। एक ग्राम पानी का तापमान एक डिग्री सेल्सियस बढ़ाने के लिए जितनी ऊष्मा की आवश्यकता होती है, उसे एक कैलोरी कहते हैं।

चीड़ व लैंटाना के कोयले की दर 6000 कैलोरी प्रतिकिलो: कोयले से 8000 कैलोरी प्रति किलो की दर से मिलती है। चीड़ व लैंटाना के कोयले की दर 6000 कैलोरी प्रतिकिलो रहती है। प्रदेश के विभिन्न भागों में चीड़ की पत्तियों व लैंटाना से कोयला बनाने के संयंत्र लगे हैं। ग्रामीण चीड़ की पत्तियां एकत्र कर संयंत्र प्रबंधन को बेचकर आजीविका कमा रहे हैं। संयंत्रों में तैयार होने वाला कोयला ईंधन के रूप में दुर्गम क्षेत्रों में खाना पकाने में प्रयोग हो रहा है। ताप विद्युत केंद्रों के रूप में मार्केट मिलने से कोयले का उत्पादन बढ़ेगा। वनों में चीड़ की पत्तियां व लैंटाना एकत्र करने का काम भी तेजी पकड़ेगा।

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