मनाली-लेह मार्ग है भ्रष्टाचार का अड्डा
August 23rd, 2019 | Post by :- | 267 Views

Report-: Jiten Thakur

रोहतांग मार्ग में लोगों के फंसने से ही तो मार्ग के लिए और बजट आता है | बस काम कागजों में हो जाता है , और तेल रास्ते में ही बिक जाता है …

मनाली लेह मार्ग पर जिस तरह से कछुआ गति से काम होता है, वह किसी से छिपा नहीं है | लेकिन शायद यह बहुत कम लोग जानते होंगे कि यह शायद जानबूझ कर किया जाता है | यह जानकार भी बेहद दुःख होगा कि सेना के पाक दामन पर दाग बीआरओ की वजह से ही लगता है |

बॉर्डर के लिए सड़कों की देखभाल, सेना का ही अंग बीआरओ, यानी बॉर्डर रोड़ ऑर्गेनाइजेस्न करता है। लेकिन सेना की छवि को बिगाडऩे में इस विंग ने अधिकतर जगहों पर कसर नहीं छोड़ी है।

मानली से रोहतांग मार्ग पिछले कई वर्षों से उसी तरह है जिस तरह आज है | वर्षों से लोग वहां घंटों ही नहीं बल्कि दिनों तक फंसे रहते हैं | लेकिन क्या बर्फ सिर्फ रोहतांग में ही पड़ता है | अमरीकी देशों में तो इससे भी कई गुना अधिक बर्फ पड़ता है लेकिन वहां की सड़कें तो इस तरह नहीं होती | हम यहां विश्लेषण करना चाहते हैं रोहतांग से लेकर लेह तक बीआरओ की इस कार्यप्रणाली पर |

वास्तव में जब भी हम इस सड़क पर सफर करते हैं तब हर दूसरे ढाबे पर डीजल मिल जाता है | और डीजल सस्ते मूल्य में | लेकिन आखिर यहां ऐसे कौन से तालाब हैं जहां सस्ता डीजल निकलता है …?

कोकसर, सिस्सू, गोंदला, तांदी, स्टिंगरी, जिस्पा, दारचा, सरचू, पांग ,लेह..सड़क पर लगभग हर जगह, ढाबों और घरों में डीजल बिकता है, अगर यह पैट्रोल पंप से लाकर रखा गया होता, तो निश्चित ही तय मूल्य से महंगा मिलता, लेकिन यहां पर तो तय मूल्य से बेहद सस्ता मिलता है.

यह डीजल बीआरओ की मशीनरी में पड़ना होता है , मगर मशीनरी में नहीं पड़ता और सीधा ढाबों तक पहुँच जाता है ,बिकने के लिए | हालाँकि कागजों में यह एक एक बूँद बिआओ की गाड़ियों में ही पड़ता है | इसी तरह जब कागजों में यह डीजल गाड़ियों में पड़ा तो कागजों में काम भी होता है |और यही कारन है इस मार्ग की दुर्गति का , कि यहां अधिकतर काम सिर्फ कागजों में ही होता है |

रोहतांग मार्ग पर हमेशा से ही चट्टानों के टुकड़ों से सुरक्षा दीवारें बनाई जाती हैं | यह सबसे घटिया इंजनियरिंग का उदाहरण होता है | वास्तव में चट्टानों के टुकड़े हलके से दबाव से ही अलग हो जाते हैं | अगर यहां सीमेंट और कंक्रीट की सुरक्षा दीवारें लगाईं जाती तो उनकी मजबूती वर्षों तक रहती | लेकिन यह इसलिए नहीं किया जाता क्यूंकि अगर यह सड़क मार्ग ठीक से बन गया तो बाद में इस मार्ग के लिए बजट शायद न आये | अगर बजट नहीं आया तो भरष्टाचार कैसे किया जा सकेगा | यहां सबसे घटिया किसम का रेत इस्तेमाल किया जाता है | यहां प्रयोग किये जाने बाले क्रसर के रेत में लगभग 60% मिटटी ही होती है ऐसे मन इसकी मजबूती कितनी होगी ,यह बताने की जरुरत नहीं है |

हर वर्ष इस मार्ग के लिए करोड़ों का बजट आता है क्यूंकि यह सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मार्ग है | पूरे मार्ग पर काम काम नेपाली मूल के हजारों लोगों द्वारा करवाया जाता है | चाहे पत्थरों को कूटना हो या बजरी बनानी हो , हर काम मजदूरों से करवाया जाता है | हालाँकि अगर यह सब गाड़ियों में मंगवाया जाये तब शायद और सस्ता पड़ेगा | यही नहीं आज देश इतना विकसित है कि इतनी आधुनिक मसीने देश के पास हैं जो इस काम को मशीनों से आसानी से कर सकता है | लेकिन बीआरओ को तो यह काम हाथों से ही करवाना है | इसके पीछे कारन यह भी है कि किसी को पता ही न चले कि आखिर मजदूर कितने लगाए हैं |
डीजल ही नहीं, जब तय सामान का एक हिस्सा बिका है, तो दूसरा भी बिका होगा । सीमेंट, रेत, बजरी, चारकोल, यही नहीं इस सड़क पर चलने बाले चालक तो यहां तक कहते हैं कि गाड़ियों के टायर और बैटरियां तक बिक जाती हैं।

कुल मिलकर बिआरओ इस मार्ग को दुरुस्त करना ही नहीं चाहती है | यह मार्ग करोड़ों के हेर फेर का जरिया बना हुआ है , ऐसे में लोग फंसते हैं तो फंसे | इसी फंसने से तो मार्ग के लिए और बजट आता है | बस काम कागजों में हो जाता है , और तेल रास्ते में ही बिक जाता है

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