कलाकेंद्र में 1857 के स्वतंत्रता संग्राम का दिखा परिदृश्य #news4
June 9th, 2022 | Post by :- | 120 Views

कुल्लू : कुल्लू के कलाकेंद्र में आयोजित तीन दिवसीय कुल्लू राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव के दूसरे दिन दृष्टि ग्रुप कुल्लू एवं पालमपुर के कलाकारों ने कंवर प्रताप सिंह नाटक का मंचन किया। राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव का आयोजन एक्टिव मोनाल कल्चरल एसोसिएशन की ओर से भाषा विभाग के सहयोग से किया गया। कुल्लू के पहले स्वतंत्रता सेनानी प्रताप सिंह के स्वतंत्रता संग्राम की कहानी इस दौरान बयां की गई, जिससे देख दर्शकों की आंखें नम हो गई।

केहर सिंह ठाकुर द्वारा लिखित और मीनाक्षी द्वारा निर्देशित नाटक 1857 में स्वतंत्रता संग्राम की जानकारी देता है। कैसे कंवर प्रताप सिंह के नेतृत्व में उनके साले बैजनाथ कांगड़ा निवासी मियां वीर सिंह के सहयोग से सिराज, आउटर सिराज, बड़ा भंगाल, कुल्लू और लाहुल स्पीति के लोग अंग्रेजों को खदेड़ने के लिए तैयार हो गए थे, लेकिन जन क्रांति का एक पत्रक पलाइच बंजार के तहसीलदार के हाथ लग जाने से योजना धरी रह गई। बिना तैयारी किए क्रांति का बिगुल बजाया। इसमें कुल्लू के डिप्टी कमीश्नर मेजर विलियम हे द्वारा सैनिक टुकड़ी बंजार भेजी जाती है। प्रताप सिंह और उनके साथियों का मुकाबला उनसे होता है, लेकिन सरकारी बंदूकों के सामने प्रताप सिंह के साथी स्थानीय बाशिंदे टिक नहीं पाते और भाग खड़े होते हैं। वे पंजाब की ओर मदद के लिए निकल जाते हैं, लेकिन कांढी जोत पर एक बार फिर से उनकी टक्कर अंग्रेजी सैनिकों से होती है। वहां वे गिरफ्तार किए जाते हैं और पकड़ कर धर्मशाला के भागसू जेल में रखकर मुकदमा चलाया जाता है। फिर अंतत तीन अगस्त 1857 को धर्मशाला के खुले मैदान में प्रताप सिंह और उनके साले वीर सिंह को देशद्रोह में मामले में फांसी पर लटकाया जाता है। साथियों में सरदूल, कांशी, थुलाराम, मानदास, सूरत राम, केशव राम, देवीदत्त और अन्य 12 क्रांतिकारियों में से सात को तीन से 14 वर्ष तक की कड़ी सजा सुनाई गई। शेष 12 क्रांतिकारियों को फांसी के फंदे का ²श्य दिखाकर एक वर्ष की जमानत पर छोड़ दिया। नाटक को देख दर्शक आज से 165 साल पीछे 1857 के परि²श्य में पहुंच गए थे। इन्होंने निभाई भूमिका

मुख्य किरदार प्रताप सिंह के रूप में वैभव ठाकुर और उनके साले वीर सिंह के रूप में श्याम लाल ने जबरदस्त अभिनय किया और अन्य भूमिकाओं में सूरज, पूजा, सपना, अनामिका, लक्ष्मी, ²ष्टि, देशराज और गौरव ने उस समय की परिस्थितियों को बनाने में बखूबी अपना योगदान दिया।

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