प्राचीन द्रोण शिव मंदिर शिवबाड़ी में लगता था मेला, आज पसरा सन्नाटा
April 25th, 2020 | Post by :- | 187 Views

प्राचीन द्रोण शिव मंदिर शिवबाड़ी में साक्षात शिव किसी न किसी रूप में तो आएंगे, लेकिन कोरोना की दुष्ट छाया के चलते यहां लगने वाले वार्षिक मेला का आयोजन नहीं होगा। पुरातन धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान शिव बैसाखी के बाद आने वाले दूसरे शनिवार को स्वयं किसी न किसी रूप में शिवबाड़ी में अपने भक्तों को आशीर्वाद देने पधारते हैं।

पुरातन कथाओं के अनुसार पांडव काल मे गुरु द्रोणाचार्य यहां अपने शिष्यों को धनुर्विद्या सिखाया करते थे। उनके साथ इस जंगल मे उनकी बेटी यजाति भी रहती थी। गुरु द्रोण अपनी आलौकिक शक्ति से रोजाना कैलाश पर्वत पर भगवान शिव की पूजा अर्चना करने जाते थे।

एक दिन गुरु द्रोणाचार्य की पुत्री यजाती ने भी कैलाश पर साथ जाने की जिद की तो गुरु द्रोण ने उसे यही पर बैठ कर भगवान शिव के बीज मंत्र ॐ नमः शिवाय का जाप करने को कहा। कुछ दिन बाद जब द्रोणाचार्य कैलाश पर जाते तो कोई बालक यजाती से खेलने के लिए आ जाता था। द्रोण पुत्री ने यह बात अपने पिता को बताई तो एक दिन गुरु द्रोण कैलाश के रास्ते से ही बालक को देखने वापस आ गए।

जब गुरु द्रोण ने वहां खेल रहे बालक को देखा तो वह भगवान भोले को पहचान गए। तब उन्होंने बताया कि यजाती प्रतिदिन सच्चे मन से मुझे याद करती थी तो वह यहां आ जाते थे। इस पर यजाती ने भगवान शिव को यही रहने की जिद की परंतु भगवान शिव ने उन्हें हर वर्ष बैसाखी से दूसरे शनिवार को यहां किसी न किसी रूप में आकर अपने भक्तों को आशीर्वाद देंगे। उसके बाद वह वहां उपस्थित पिंडी में ज्योति के रूप में अंतर्ध्यान हो गए। उस दिन के बाद पुरातन काल से बैसाखी के दूसरे शनिवार को इस मेला का आयोजन होता है। इस बार भी भगवान शिव तो आएंगे परंतु मेले की रौनक नहीं होगी। फिर भी शिव भक्तों की भगवान शिव पर अटूट आस्था है कि कोरोना से युद्ध मे वह उनके साथ है।

अद्भुत रहस्य समेटे है चारों और से घने जंगल में विराजमान  द्रोण शिव मंदिर

प्राचीन द्रोण शिव मंदिर के चारो और लगभग पांच हजार वर्ग मीटर का घना जंगल है तथा इस जंगल की अलौकिक छटा किसी भी आगुन्तक को अपनी और आकर्षित करती है। इस जंगल की खासियत यह है कि इस जंगल की लकड़ी पर सिर्फ मुर्दो का ही हक है। यानी इस जंगल की लकड़ी मात्र चिता जलाने के काम ही आती है यहां की लकड़ी को घर ले जा कर चूल्हे में नहीं जलाया जा सकता। इस जंगल के तीन और शमशान है तथा एक और पवित्र सोमभद्रा नदी बहती है तथा इस जंगल के चारो और चार कुएं भी हैं।

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