बलिदान पर लगता था मेला, इस बार सब सुना
April 10th, 2020 | Post by :- | 158 Views

रानी सुनैयना के बलिदान का प्रतीक सूही मेला इस बार विश्व भर में फैले कोरोना वायरस के कारण नहीं हो पाया है। बलिदान की विरासत पर बसे हसीन नगर चंबा का इतिहास सूही मेले के दौरान याद किया जाता है। इस दौरान नृत्य होता है और आंसू भी निकलते हैं। मगर इस बार दुनियां भर में फैली कोरोना महामारी के कारण न नृत्य होगा, न ही आंसू निकल पाएंगे। शुक्रवार को प्रशासन व नगर परिषद चंबा ने मात्र औपचारिकता के तौर पर राज परिवार की कन्या वसुंद्रा वर्मन द्वारा पिंक पैलेस सहित राजनौण व सूही मंदिर में पूजा अर्चना की। रानी सुनैयना के साथ चंबा के लोगों का एक भावनात्मक लगाव है। छठी शताब्दी में चंबा की रानी सुनैयना प्रजा की प्यास बुझाने के लिए जिदा जमीन में दफन हो गई थी। इसका उल्लेख साहिल बर्मन के पुत्र युगाकर बर्मन के एक ताम्रलेख में भी मिलता है, जिसमें रानी के बलिदान की कहानी लिखी गई है। कहा जाता है कि चंबा नगर की स्थापना के वक्त वहां पर पानी की बहुत समस्या थी। इस समस्या को दूर करने के लिए चंबा के राजा ने नगर से करीब दो मील दूर सरौथा नाला से नगर तक कूहल के माध्यम से पानी लाने का आदेश दिया। राजा के आदेशों पर कूहल का निर्माण कार्य किया गया और कर्मचारियों के प्रयासों के बावजूद इसमें पानी नहीं आया। कथा के अनुसार एक राजा को स्वप्न में आकाशवाणी सुनाई दी, जिसमें कहा गया कि कूहल में तभी पानी आएगा जब पानी के मूल स्त्रोत पर रानी या एक पुत्र को जीवित जमीन में दफना दिया जाए। राजा इस स्वप्न को लेकर काफी परेशान रहने लगा। इस बीच रानी सुनैयना ने राजा से परेशानी की वजह पूछी तो उसने स्वप्न की सारी बात बता दी। लिहाजा रानी सुनैयना ने खुशी से प्रजा की खातिर अपना बलिदान देने की बात कह डाली। कहा जाता है कि जिस वक्त रानी पानी के मूल स्त्रोत तक गई तो उसके साथ कई दासियां, राजा, पुत्र और हजारों की संख्या में लोग भी पहुंच गए थे। बलोठ गांव से लाई जा रही कूहल पर एक बड़ी क्रब तैयार की गई और रानी ने साज-श्रृंगार के साथ जब क्रब में प्रवेश किया तो पूरी घाटी में मातम छा गया। क्रब से जैसे-जैसे मिट्टी भरने लगी, कूहल में भी पानी चढ़ने लगा। चंबा शहर के लिए आज भी इसी कूहल में पानी बहता है, लेकिन वक्त के साथ-साथ शहर में अब नलों के जरिए इस कूहल का पानी पहुंचाया जाता है। इस तरह चंबा नगर में पानी आ गया और राजा साहिल बर्मन ने रानी की स्मृति में नगर के ऊपर बहती कूहल के किनारे रानी की समाधि बना दी। इस समाधि पर रानी की स्मृति में एक पत्थर की प्रतिमा विराजमान है, जिसे आज भी चंबा के लोग विशेषकर औरतें पूजती हैं। प्रति वर्ष रानी की याद और बलिदान की स्मृति में 15 चैत्र से पहली बैशाख तक मेले का आयोजन किया जाता है, जिसे सुई मेला कहते हैं। मेले में केवल स्त्रियां और बच्चे ही जाते हैं। महिलाएं रानी की प्रशंसा में लोकगीत गाती हैं और समाधि तथा प्रतिमा पर फूल की वर्षा की जाती है। पिदड़ी का स्वाद चखने मायके नहीं जा पाएंगी बेटियां

सूही माता मेले के समापन के बाद 14 अप्रैल को इस बार बेटियां अपने मायके पिदड़ी का स्वाद चखने नहीं जा पाएंगी। रानी सुनैयना के बलिदान को चंबा शहर के लोग याद करते हैं। 14 अप्रैल को बसोआ का आयोजन किया जाता है। इसके लिए मायका पक्ष से विवाहित बेटियों को सादा (निमंत्रण) भेजा जाता है। बेटियां 14 अप्रैल को अपने मायके आती हैं और त्योहार का प्रमुख व्यंजन पिदड़ी का स्वाद चखती हैं। कोरोना वायरस के चलते इस बार चंबा का ऐतिहासिक सूही मेले को नही मनाया जाएगा। इस बार मात्र राजकुमारी व पूजारी सहित दो पार्षदों द्वारा सुबह शाम पूजा की जाएगी। अगले वर्ष इस मेले को धूमधाम से मनाया जाएगा।

नीलम नैयर, अध्यक्ष नप चंबा

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