1 साल पहले पकड़ी हॉकी, चैंपियन बन स्टेट लेवल पर जिले को 16 साल बाद जिताया मैडल #news4
October 7th, 2022 | Post by :- | 90 Views

परौर : सुविधाओं के अभाव में अभिभावकों का रुझान भले ही सरकारी स्कूलों की तरफ कम हो रहा है लेकिन उनमें पढ़ाई कर रहीं बेटियां अपने हुनर से स्कूल का नाम रोशन कर रही हैं। ऐसा कर दिखाया है सुलह विधानसभा के तहत आते राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला थुरल की छात्राओं ने। अंडर-14 में पहले गंगथ में हुई जिला स्तरीय हॉकी गेम में थुरल स्कूल की छात्राएं चैंपियन रही थीं। वहां उनके शानदार प्रदर्शन को देखते हुए करीब 16 साल बाद स्कूल की 11 छात्राओं के दम पर राज्य स्तरीय हॉकी गेम के लिए कांगड़ा जिले से 15 खिलाड़ियों की टीम चुनी गई। मंडी के सरकाघाट में हुई राज्य स्तरीय हॉकी गेम में स्कूल की टीम सैमीफाइनल में शिमला से मैच ड्रा होने के बाद हुए टॉस के कारण हार गई और कांस्य पदक से संतुष्ट होना पड़ा। इसके बाद स्कूल की दो छात्राओं अर्चना और शिमरण का चयन नैशनल के लिए हुआ है। हॉकी गेम में प्रदेश के 11 जिलों की टीमों ने हिस्सा लिया था। खास बात है कि स्कूल की छात्राओं ने एक साल पहले हॉकी उठाई थी। अधिकतर छात्राएं ग्रामीण क्षेत्रों से पैदल पहुंचकर स्कूल में प्रैक्टिस करती हैं। वहीं स्कूल में ग्राऊंड भी उस स्तर का नहीं है जहां पूरी प्रैक्टिस करवाई जा सके।

कोच खुद हॉकी की जुनुनी, पिछले साल जीता था गोल्ड
स्पोर्ट्स कोटे से भर्ती हुई राजकीय वरिष्ठ स्कूल थुरल की पीटीआई शगुन डोगरा खुद हॉकी की नेशनल खिलाड़ी रही हैं। पिछली बार मास्टर गेम्स में हिस्सा लेकर उनकी टीम चैंपियन रही थी। वह बताती हैं कि कोरोना काल के बाद शुरुआत में बेटियों को तैयार कराने में मुश्किल आईं। कई बेटियों के अभिभावकों ने प्रेक्टिस कराने से मना किया।  लेकिन धीरे-धीरे अच्छा खेल रही हैं। सभी छात्राएं खेलने के साथ पढ़ाई में भी अव्वल हैं। जैसे बेटियां खेली हैं अगली बार राज्य स्तरीय खेलों में गोल्ड की उम्मीद है।

अभिभावकों से कहा था बच्चों की डाइट बढ़ाने को 
राजकीय वरिष्ठ स्कूल थुरल के प्रिंसीपल संजीव जम्वाल ने बताया कि बच्चियों को तैयार करना चुनौती थी। अधिकतर बच्चे गांव से हैं। उनका स्टैमिना बढ़ाने और सिखाने में काफी मेहनत करती पड़ी। अभिभावकों को भी उनकी डाइट बढ़ाने के लिए कहा गया था। गे स में शानदार प्रदर्शन के लिए खिलाड़ियाें के साथ स्कूल स्टाफ और उनके अभिभावक बधाई के पात्र हैं।

शुरू में मां रोकती थी खेलने से
स्कूल की एक खिलाड़ी अर्चना के खेल को देखते हुए उन्हें हाेस्टल वालों ने चयनित किया है। इसके साथ उसका चयन राष्ट्रीय खेलों के लिए हुआ है। अर्चना के पिता मिस्त्री जबकि माता आशा घर पर रहती हैं। शुरूआत में जब बेटी स्कूल से लेट आती थी और प्रैक्टिस से चेहरा काला पड़ता था तब मां खेलने से रोकती थी। इसके लिए पीटीआई से भी कहा था। हालांकि अब वह बताती हैं कि पढ़ी नहीं थीं और खेल का पता न होने से डर लगता था। वहीं अर्चना ने बताया कि वह जल्द हास्टल ज्वाइन करूंगी।

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